Tuesday, February 16, 2021

Journey from finite to infinity can happen only with the help of Kundalini Shakti

 श्री माताजी की दिव्य वाणी 


आदिकाल से हर एक दार्शनिक  (Philosopher) ने एक बात की ओर संकेत किया हुआ था कि हम जो जड़ वस्तु हैं, हमारा मन भी जो जड़ वस्तु है वो सीमित (Finite) है, वो इस सूक्ष्म में कैसे उतरेगा, वो असीम (Infinite) में कैसे उतरेगा, प्रश्न एक छोटा सा है कि हम सब जड़ वस्तु से बने हुए हैं और सीमित हैं, वो परमात्मा अगर असीम है तो उसमें कैसे उतर सकता है, उसे कैसे जान सकता है, गर हम अपने मन से प्रश्न करें परमात्मा को जानने की, तो हम पढेंगे, लिखेंगे, किताबें हमारे सामने खुलती जायेंगी लेकिन हम किस तरह से वहाँ पूछ सकते हैं जो हमारा स्त्रोत है, सारा प्रश्न यहाँ आकर रूक जाता है, सारी समस्या यही एक है कि इस जड़ देह से उस चेतन में कैसे उतरा जायेगा, उस चेतन को इस जड़ता से कैसे जाना जायेगा, इसे कुण्डलिनी से जान सकते हैं, कुण्डलिनी के जागरण के बगैर उस असीम में नहीं पहुँच सकते हैं


"सीमित से असीमित की ओर" 


 "प्रभु के प्रेम का अनुभव" 

 दिसम्बर 1975

 मुम्बई



The knowledge of truth is the knowledge of God.

 वास्तविक ज्ञान को यह मस्तिष्क भी अस्वीकार नहीं कर सकता।


"परमात्मा क्या है?, इसी को जानना ही वास्तविक ज्ञान है। 

और अगर, उस परमात्मा का अस्तित्व है, तो आप किस तरह से किसी चीज़ पर अविश्वास कर सकते हैं, कैसे आप किसी चीज़ का विश्लेषण करने की कोशिश कर सकते हैं? यह परमात्मा हैं।

 यह सर्वशक्तिमान परमात्मा हैं, जो हर एक चीज़ को जानते हैं, जो हर एक चीज़ का आनंद लेते हैं। आपको कहना चाहिए कि केवल एक वही (परमात्मा) ही ज्ञान हैं, सच्चा ज्ञान हैं, शुद्ध ज्ञान हैं। 

यह चक्रों का ही ज्ञान नहीं है, चैतन्य लहरियों का ही ज्ञान नहीं है, कुंडलिनी का ही ज्ञान नहीं है, अपितु यह सर्वशक्तिमान परमात्मा का ज्ञान है। 

और परमात्मा का ज्ञान, मानसिक ज्ञान नहीं है। 

मैं आपको पुनः बताना चाहती हूँ कि यह ज्ञान आपके हृदय से शुरू होकर आपके मस्तिष्क तक जाता है, यह वह ज्ञान है जो आपको आनंद की अनुभूति से प्राप्त होता है, और आपके मस्तिष्क को ढक लेता है। अतः आपका मस्तिष्क अब इसे (परमात्मा की सच्चाई को) अस्वीकार नहीं कर सकता।"


परम पूज्य माताजी श्री निर्मला देवी ।

16 फरवरी 1991

Wednesday, February 10, 2021

Qualities of the Soul - Atman Ke Gun

 आत्मा के गुण

● अबोधिता आत्मा है और आत्मा ही अबोधिता है, जिसे कोई भी नष्ट नहीं कर सकता। सहजयोग के माध्यम से (मूलाधार चक्र के शुध्दीकरण से ) अबोधिता को  पुनर्स्थापित क्रिया जा सकता है।सहजयोग अबोध बनने की उपयुक्त विधि है। हमारी निर्विचार चेतना से अबोधिता विकसित होती है। जब आप निर्विचार चेतना में होते हैं, तो आप प्रतिक्रिया नही करते और न ही गवत चीजों से लिप्त होते हैं। आप चीजों को केवल देखते हैं। तब आपमें अन्तनिर्हित अबोधिता अत्यंत सुंदरता पूर्वक जागृत होती हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे गन्दे पाणी के तालाब से कमल खिलता हैं।

प.पू.श्रीमाताजी, १६.९.२०००


● पवित्रता:-पवित्रता आनंदमयी है, केवल आनन्दमयी ही नहीं, यह पूरे व्यक्तित्व को सुगंधमय कर देती हैं।

प.पू.श्रीमाताजी,२९.११.१९८४


● दृष्टि की पवित्रता और विचारों की पवित्रता....आपकी दृष्टि यदि पवित्र हैं तभी आप परमात्मा के प्रेम का आनंद उठा सकते हैं अन्यथा नही.....पावन प्रेम में वासना और लोभ का कोई स्थान नहीं होता....जैसा कि मेरा नाम दर्शता हैं.आप मेरे बच्चे हैं। आप निर्मल के बच्चे हैं, अर्थात पावनता के पावनता ही आपके जीवन का आधार है।

प.पू.श्रीमाताजी, टर्की,२३.४.२०००


● जैसे ही आपका गणेश तत्व जमना शुरू होते जाएगा....आनंद अन्दर से आने लग जाता है। क्योंकि तत्व निर्मल है, पवित्र है।इसलिये अपने गणेश तत्व (मूलाधार चक्र) को आपको बहुत सुधारू रूप से संम्भालना चाहिए।

प.पू.श्रीमाताजी ,१५.२.१९८१


● अबोधिता:- श्री गणेश हमारेअन्दर अबोधिता के स्त्रोत हैं।अबोधिता ऐसी शक्ति है जो आपकी रक्षा करती है और ज्ञान का प्रकाश प्रदान करती है। यही अबोधिता आपको अन्य लोगों से प्रैम करना ,उनकी देखभाल करना, उनके प्रति भद्र होना सिखती है। अबोधिता में भय बिलकुल भी नहीं होता। जैसे बच्चा अपनी अबोधिता में जानता है कि उसकी देखभाल हो रही है और वह सुरक्षित है। वह जानता है कि कोई शक्ति है जो बहुत ऊंची है। उसे चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

प.पू.श्री माताजी, कोमोरोस, २५.१०.१९८७


● अबोधिता की यह पहचान है कि मनुष्य को सभी में पवित्रता दिखायी देती है, क्योकि अपने आप पवित्र होने के कारण वह अपवित्र नजरों से किसी को नहीं देखता है।

प.पू.श्री माताजी, बम्बई, २२.९.१९७९


● अबोधिता पूर्ण सच्चा विवेक है। किसी मकसद के लिये यह कार्य नहीं करता, यह निर्व्याज‌ हैं,पूर्ण नि:स्वार्थ होने के कारण यह आनन्द की ऊंचाईयो को प्राप्त कर लेता है।अबोधिता ही आपको नैतिक शक्ति तथा नैतिक सूझबूझ प्रदान करती है। अबोधिता में व्यक्ति को शान्त करने की शक्ति है, अत्यंत शांत,क्रोध और हिंसाविहीन अबोध व्यक्ति निश्र्चित होता है और निश्छल जीवन-यापन करता है।

प.पू.श्रीमाताजी,१६.९.२०००


● आध्यात्मिक व्यक्ति अबोध होता है।अबोध ,उसमें चालाकी नहीं होती। अबोधिता ही सभी कुछ है। व्यक्ति जो कुछ भी बोलता है,कहता है,यह अबोधिता से ही आता है,इसमें पुस्तकों से पर्यावरण की हुई बौद्धिकता नहीं होती। ऐसा कुछ भी नहीं होता इसमें तो केवल शुध्द और सहज अबोधिता होती है जो बहुत अच्छी तरह कार्य करती है। यह इतकी स्वच्छ है,यह केवल वही कहती है जो यह जानती है और यह उच्चतम है।अबोध लोगो को अबोधिता ही समाधान प्रदान करती है। अबोधिता पर पूरा भौतिक विश्र्व भी आक्रमण नही‌ कर सकता। इसे नष्ट नहीं किया जा सकता। अबोधिता सर्वव्यापी है।परंतु इसे आच्छादित किया जा सकता है, क्योकि यह तो अपने ही तरीके से कार्य करेगी। इसे विकसित करने‌ का प्रयास  करें ....नेति नेति कहते हुये इस अबोधिता के तत्व को विकसित करे अपने सारे दोषों  को नेति-नेति' कहते रहें, नेति-नेति' कहते हुए आप 'ये मेरा नही' , 'ये मेरा नही'है' ये मेरा नहीं है' पर पहुंच जाते है।

प.पू.श्री माताजी, १.१.१९८३

LET YOUR SPIRIT RULE

 आप आत्मा के शासन में रहें, सुख-सुविधा को मस्तिष्क पर हावी न होने दें ।


"पश्चिम के कुछ सहजयोगियों को भारत के गांवों में लाने के पीछे मेरी सोच यह थी, कि वे लोग समझें कि आराम ही जीवन का लक्ष्य नहीं है, क्योंकि हमारे पास ऐसे ग्रामीण हैं, जो आत्मसाक्षात्कारी आत्माएं हैं, जिनके पास आराम के ऐसे कोई साधन नहीं हैं, जिन्हें पश्चिमी लोग अत्यंत ज़रूरी मानते हैं, लेकिन ये ग्रामीण बहुत प्रसन्न, संतुष्ट व शांत लोग हैं, और ये बहुत अच्छे योगी हैं । लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आप सारी सुख-सुविधाएँ त्याग दें और आप धार्मिक बन जाएं। 

अगर आप इसे नकारने (नेति-नेति) के तरीके से सोचें, तो ये सब एक मानसिक प्रक्रिया है। यह सही तरीका नहीं है। परंतु जब आप भारत में आते हैं, तो आपको समझना होगा कि आराम खोजने की यह आदत आपको छोड़नी होगी। अगर आपको ऐसी कोई एकाध आदत है, तो ठीक है, लेकिन आराम को अपने मस्तिष्क में न बिठाएं ।

 अपनी आत्मा को अपने ऊपर शासन करने दें, न कि इस विचार को कि आपको अमीरी में या आराम से रहना चाहिए। वैसा विचार आपके ऊपर हावी नहीं होना चाहिए।


परम पूज्य माताजी श्री निर्मला देवी ।

10 फरवरी 1982



LET YOUR SPIRIT RULE


My idea of bringing some of the Sahaja Yogis from the West to India in the villages of India was to make them understand that comfort is not the goal of life because we have villagers who are realized souls, who do not have any comforts which are so important to the western people, but are very happy, satisfied and peaceful people and are extremely good yogis. 

But that does not mean that you give up your comforts and you become godly. It is all a mental behaviour if you think by negation. It is not the way. But when you come to India, you understand that this habit of seeking comfort must be given up. 

If you have any, it is all right, but let not the comfort sit on your head. Let your spirit rule and not the idea that you should be comfortable or affluent. That idea should not rule you.


H. H. Shree Mataji Nirmala Devi

10 FEBRUARY 1983

Sunday, February 7, 2021

Sahaja Krishi Program - In Uttar Pradesh

 जय श्री माताजी🙏🏼🙏🏼🙏🏼


परम पूज्य श्री माताजी की असीम कृपा से सहजयोग आत्मसाक्षात्कार एवं सहज कृषि कार्यक्रम का आयोजन फरुखाबाद, उत्तरप्रदेश में किया गया है, जो की श्रृंगी ऋषि व महात्मा बुद्ध की तपस्थली और आयुर्वेद के जनक चरक ऋषी की जन्मस्थली है साथ ही में कम्पिल कुमारी साक्षात विष्णु माया का अवतरण द्रौपदी की जन्मभूमि व अपरा काशी कहे जाने वाले शहर मे प्रति वर्ष माँ गंगा के पावन तट पर लगने वाला मेला  (राम नगरिया) जिसे छोटा कुम्भ भी कहा जाता है।


पिछले साल की तरह इस वर्ष भी 29 जनवरी से 27 फरवरी तक माघ मास में मेला (छोटा कुम्भा) लगा है जिसमें आस पास के लगभग आठ दस जिलों के लोग एक माह का कल्प वास करते हैं माँ गंगा की अराधना करने आते है एवं अनेक जिले के हजारों लोग प्रतिदिन इस मेले में बड़ी संख्या में आते हैं।


सहजयोग प्रचार प्रसार हेतु एक पंडाल लगाया गया है,और कार्य की शुरुवात अच्छे से हुई, बड़ी संख्या में नए लोग सहजयोग के पंडाल मे आ रहे है जिसमे लोगो को सहजयोग ध्यान,आत्मसाक्षात्कार और सहज कृषि के बारे में जानकारी दी जा रही है। सभी सहजयोगी भाइयो व बहनों से गुजारिश है, इस दिव्य कार्य मे सहभागी बने और श्री माँ का आशीर्वाद पाएं।


श्री माँ की कृपा से फरुखाबाद,उन्नाव,कानपुर देहात और आस पास के सभी सेंटर की सामूहिकता द्वार प्रचार प्रसार के कार्य में अच्छा योगदान दिया जा रहा है।


आइये श्री माताजी से प्रार्थना करें कि ज्यादा से ज्यादा लोगो तक सहजयोग ध्यान का महत्व और सहज कृषि से होने वाले फायदे पहुचे और सभी को माँ का प्यार और आशीर्वाद प्राप्त हो।


सूचना: यह कार्यक्रम सरकार के सभी नियमों के पालन के साथ किया जा रहा है इसीलिए अपने साथ अपना मास्क और सेनिटाइजर बोत्तल अपने साथ ही रखे और सोश्यल डिस्टनसिंग का ज़रूर पालन करें।


अलख जगाओ अलख जगाओ,

सहजयोग सहज कृषि फैलाओ


सहज कृषि अभियान।🌱🌱🌱🌱


जय श्री माताजी





Wednesday, February 3, 2021

Shri Mataji Resides on the Sahasrara - Hindi Article

 ॐ जय श्री माताजी ॐ 

तुम्हारी माँ सहस्त्रार मैं निवास करती हैं । वह मेरा घर है । जैसे - जैसे तुम ध्यान करते हो वैसे - वैसे तुम्हारा चित्त ऊपर की और प्रवाहित होता है । यह चित्त तुम्हें मेरा निवास जहाँ है उसके पास लाता है । सर्वप्रथम ध्यान मैं रखिये की ध्यान मैं बैठते समय यह निश्चित न करो की कुछ भी कर तुम्हें मेंरा दर्शन लेना ही चाहिए । तुम्हारे ध्यान की दिशा मेरी प्रतिमा ढूँढने के लिए न मोड़ो । शुरू - शुरू मैं तुम्हारा ध्यान पूर्व की तरह ही रहने दो । लेकिन जब तुम मेरे फोटो के सामने ध्यान नहीं करते हो और दैनंदिन नित्य कर्म मैं व्यस्त रहते हो । ऐसे समय अपना चित्त सहस्त्रार मैं रखने का यत्न करो । धीरे - धीरे तुम निरंतर ध्यान मैं रह सकोगे । तुम बिलकुल विचलित न हो सकोगे । यह मुश्किल नहीं है और यह आप कर सकोगे । कितने ही लोगो को यह संभव हो चूका है । तुम्हारा ध्येय "पीछे देखना " नहीं होना चाहिए । यह घटित हुआ तो उत्तम , न हुआ तो भी बुरा नहीं । खूब सहजयोगी जो सहस्त्रार मैं पहुचे है और मरते चरणों मैं हैं भौतिक जगत मैं वे इस सबका अंदाज भी नहीं कर सकते । उसके कुछ कारन हैं ।

सर्वप्रथम यह महत्वपूर्ण है की आपका चित्त अधिकाधिक सहस्त्रार में  होना चाहिए ।

 सहजयोगी की जीवन पध्हती का अर्थ ही है यह । तुम जबरदस्ती से कई भी चीज नहीं कर सकते । तुम्हें चुनाव का स्वातंत्र्य है । लेकिन इस स्वतंत्रता मैं तुम पूर्ण स्वातंत्र्य (मुक्ति ) का चुनाव कर सकए हो यह इसलिए है की जो बहुत पूर्व से इसकी वाट जोह रहे हैं और इस उदिस्ती को पहुचने के पूर्व तयारी मैं हैं । जो सहस्त्रार मैं से मुझसे संपर्क मैं होते हैं वे आपको उनका जीवन कितना बदल गया है इस बारे मैं बताएँगे । यह याने शिक्षा का बंधन फेक देने के सामान है । वहां सिखाने जैसा कुछ भी नहीं रहता । तुम्हें किसी पाठ्य पुस्तक , स्वाध्याय पुस्तक आदि की जरुरत नहीं । अब सारा ज्ञान आप में  ही निहित है । अर्थात तुम ही अपनी ज्ञानरूपी श्रेणी ऊँची उठाते जाते हो अगर आपका निर्णय पक्का होगा तो तुम तैयार होते हो । मैं हमेशा उसकी राह देख रही हूँ ।

  आज्ञा चक्र कितना धोखा दायक है यह तुम सबको मालूम है इसलिए तुम्हें ध्यान में  रखना चाहिए की आज्ञाचक्र में  से तुम्हें कोई सी भी चीज जांचने से कुछ भी साध्य नहीं होगा , सर्वप्रथम तुम्हें ध्यान में  रखना चाहिए की अपना चित्त किन चीजो पर जा रहा है । 

सामान्यतः तुम्हें आज्ञा चक्र छोड़कर अपने चित्त को ऊपर उठाना चाहिए । 

ध्यान के सामर्थ्य से तुम अपना चित्त सदैव सहस्त्रार में  रख सकते हो । अगर ऐसा होता है तो तुम मुझे सहस्त्रार में  देख सकते हो इसी का अर्थ है आपके प्रयत्न साकार होंगे । तुम धेय्य के नजदीक होंगे तुम्हें आनंद दायक , आश्चर्यजनक घटना घटित होंगी । तुम बाहरी घटनाओ पर विश्वाश रखते हो , आपका चित्त सहस्त्रार में  रखते हुए उन घटनाओं की और देखने पर तुम्हें क्या अनुभव होता है यह देखो ।

हमें ऐसा कहना चाहिए की तुम अपनी आँखें खुली रखते हो (सत्य के मार्ग पर ) उस समय आपकी अन्तस्थ दिव्य दृष्टी अधिक अच्छी तरह से कार्य करती है । हमेशा जब हम आँखों से देखते हैं आज्ञा चक्र कार्यरत होता है और इसलिए अपने स्वयं के भीतर अन्त्स्थित दिव्य दृष्टी से देखते रहते हैं । आपके प्रयत्न यशस्वी होंगे ही ऐसा नहीं । लेकिन आप प्रयत्न पूर्वक यह साध्य कर सकते हो , मुझे सहस्त्रार में  देखना याने मेरी छवि देखना नहीं वह तो आप मुझे एहिक जीवन में  भी देख रहे हैं क्यंकि मैं जीवित हूँ । इसका अर्थ है निश्चित मोहजाल में  ही प्रवत्त रहना । पर यह मोहजाल सत्य है । इससे अधिक यह कहना अधिक उचित होगा की इस मोहजाल को ही सत्य माने ।

आपके व्यवहार वर्ताव में  परिपूर्णता रहे इसलिए आपकी माँ ने आपकी सर्वश्वी व्यवस्था की है ।

 आप अगर योग्य स्थिति मैं नहीं हो तो आपकी प्रगति नहीं हो सकती । एक बार अगर आप पूर्ण स्थिति को प्राप्त हुए तो आप उससे दूर हो ही नहीं सकते । अगर आपसे कुछ गलतियाँ हुईं हैं , कुछ गलत घटित हुआ है तो आपको मेरे चरणों में  लीनं होकर क्षमा मांगनी चाहिए और आपकी माँ क्या कह रही है इसकी और चित्तपूर्वक ध्यान देना चाहिए । इसलिए मूलतत्वों के अंतर्गत मोहजाल मैं आप शुरू - शुरू में कुछ समय तक फसते हैं । लेकिन आपको चाहिए की आप आदिशक्ति के बाजू में  नज़दीक खड़े रहना सीखें । निश्चित ही यह सरल नहीं है । बहुत मुश्किल है । जब आप माँ को प्रत्यक्ष देखोगे तब तुम्हारे ध्यान में  आएगा और मुझे देखना तभी संभव होगा जब आप सहस्त्रार में  प्रवेश करते हो जिसके लिए मैंने पहले ही कहा है की आपका व्यवहार वर्ताव परिपूर्ण होना चाहिए । वहां (सहस्त्र मैं ) आपको पूजा के सभी अधिकार प्राप्त होते हैं ।

सहस्त्रार में  आप कोई भी परिवर्तन नहीं कर सकते जो सत्य है वह वैसे ही दिखता है । 

आग्या चक्र में  से और सहस्त्रार में  से देखने में  यही फर्क है । आग्या चक्र में  से आप अपनी सुविधा अनुसार (दिमाग से ) कोई भी कल्पना कर सकते हैं । लेकिन सहस्त्रार मैं आप केवल एक विनम्र साक्षीदार होते हैं । तुम्हारी माँ के विभिन्न रूप देख सकते हो । आपकी माँ शक्ति को पहचान सकते हो । जरा रुको तुम्हारे पास " तुम्हारी माँ का (आदिशक्ति का ) ध्यान जाने दो फिर तुहें माँ के विविध रूप देखने को मिलेंगे । माँ की शक्ति पहचान आएगी । यह अगर घटित हुआ तो आप देखेंगे तुम्हारा जीवन (आयुष्य ) पूर्णत बदल चूका होगा ।

आप मेरा नित्य तुम्हारे पास अनुभव ले सकेंगे । कोई भी कार्य करते समय स्वयं मेरे चरणों में  देख सकोगे । कोई भी चीज करते समय ध्यान में रहेगा की माँ आपकी तरफ देख रहीं है । आपके प्रत्येक क्षण पर माँ की नज़र है । यह कभी - कभी मेरे लिए आनंदपूर्ण अनुभव होता है यह आपको ध्यान मैं आएगा । इसके बाद मैं निरंतर आपके साथ रहूंगी और केवल आप ही मुझे देख सकते हो दूसरा कोई नहीं । आपने स्वप्न में  भी जिस बात की तनिक विचार नेहं किया वह सत्य घटित होने वाला है । मुझे देखना यही ध्यान है इसलिए आप्ध्य में  हो या नहीं आपको कोई फरक पड़ने वाला नहीं है क्यूंकि आप निरंतर मुझे देख रहे हैं । आप सदैव ध्यान में  ही रहने वाले हो आप ध्यान स्वरुप ही होने वाले हैं । आप जब गाड़ी चला रहे होंगे तब भी मैं आपके साथ होउंगी । जिनके पास मेरा फोटो होगा उस प्रत्येक की मैं माँ रहूंगी । यह आपकी भी परीक्षा है ।

धीरे - धीरे आपकी नज़र इतनी सूक्ष्म होगी की आप मेरे शरीर पर पहनी हुई साडी का धागा भी पहचान सकोगे और ऐसा ही अन्य बातें तफसील के साथ जानोगे फिर भी आप निश्चय पूर्वक एक ही स्थिति मैं नहीं रह पाओगे और उसका परिणाम तुम्हारे सूक्ष्मता से दिखने वाले द्रश्य परिणामो पर होगा । कुछ लोगो को मैं अगर स्पस्ट नहीं दिखाई दी तो उन्हें दर लगता है , वे आशंकित होते हैं क्या यही अपनी माँ हैं , क्या माँ ही हैं ये ? इसका मतलब है आपके आग्या चक्र पर अतिरिक्त दवाव आया है और अपना चित्त सहस्त्रार मैं स्थित करो । आपकी खोए हुई स्थिति तुम्हें पुनः प्राप्त होगी । कभी - कभी सहत्रार मैं आपके सहमे हुए चेहरे देखकर बड़ी मजा आती है । मेरी माँ कहाँ हैं ? हे भगवान! क्या हुआ होगा । मुझसे माँ को किसने छीन लिया । कुल मिलाकर आप बहुत घबरा जाते हो । परन्तु कुछ प्रसंगों मैं किसी कारणवश मुझे मेरी जगह मेरा स्थान छोड़ना पड़ता है । ऐसे अवसर पर आपको घबराने की जरुरत नहीं । तुम्हारे सम्बन्ध मैं अनेक विनोदपूर्ण घटनाएँ घटतीं हैं । आप अपने विनोद बुद्धि के आधार पर स्वयं की और देखो । फिर आप जन पाओगे की आप कैसे नन्हे शिशु की तरह हैं जैसे नन्हा बच्चा अपनी माँ के इर्द गिर्द लाइन में  मजे में होता है । आप एक दुसरे के तरफ मजाकिया लहजे मैं देख रहे हो । वहां आपका अहंकार अस्तित्व मैं नहीं रहता । आप सहस्त्रार मैं अहंकार रहित रहते हो । सहस्त्रार मैं यह सब कुछ मोहमय और आकर्षक होता है । लेकिन ऐसे ही अगर आप भौतिक जगत मैं रहोगे तो आपकी रवानगी पागलो के अस्पताल मैं होगी । यह स्वतंत्रता केवल सहस्त्रार मैन्ही प्राप्त होती है । 

अब आप मजबूती के साथ कह सकते हो "मेरे नन्हें बचपन का स्वागत हो !" ।

 मेरे अनेक रूप हैं । आप मेरे चेहरे की और देखो और कौन से भाव व्यक्त हो रहे हैं इसे देखो । तुम्हें उस प्रसंग मैं योग्य मार्ग प्राप्त होगा उसे स्वीकार कीजिये और वह क्या है इस और ध्यान दो । आप मुझप्रश्न पूछ सकते हैं , विनती (प्रार्थना)कर सकते हैं और सभी प्रश्न इसी जगह हल कर सकते हो । यह आश्चर्य जनक शक्ति आपको प्राप्त हुई की आपकी और आगे प्रगति होते रहती है । आपको अगर कुछ भी नहीं चाहिए फिर भी आप मेरे पास बैठ सकते हैं । यह स्वतंत्रता आपको है । अगर मैंने आपसे बातें की तो उन्हें ग्रहण करोगे । यह सब एहिक जीवन के समान ही घटित होगा पर उससे भी अधिक सुन्दर होगा कारन आपकी माँ आपको छोड़कर कहीं नहीं जाएगी । तुम मेरे आँचल में निश्चिंत सो सकोगे । अब अनंत तक आप अपनी माँ के साथ हो । तुम जब कभी भौतिक जीवन में झांककर देखोगे तो आपके ध्यान मैं आएगा की यह कितना बड़ा मायाजाल है । पर वह आप स्वयं हो । जिन्हें इस सत्य का बहन हो चूका है । आपका काम हो चूका है आपको अब कुछ भी मुश्किल नहीं यह सब आपने अनुभव किया है ।

आपकी पूर्ण स्वतंत्रता के लिए आपको अनंत आशीर्वाद !



Monday, February 1, 2021

Mahatma Gandhi and his Sahaja ideals!

 

महात्मा गांधी - उनकी विश्व शांति की परिकल्पना

मोहनदास करमचंद गांधी- एक महात्मा

आज हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जिन्हें प्रेम से हम ‘बापू’ बुलाते हैं, की पुण्यतिथि मना रहे हैं। सारे विश्व में विभिन्न नेता, क्रांतिकारी, विचारक, लेखक और वैज्ञानिक उनसे प्रेरित हुए और अपने चारों ओर के समाज को परिवर्तित किया। उनकी शक्ति का स्रोत- कमजोरों का सशक्तिकरण; उनकी धुन का स्रोत-सत्य की अटल खोज; उनके आकर्षण का स्रोत- निर्भयता से अपने विश्वास का हमेशा अनुसरण करना; उनकी विश्वसनीयता का स्रोत- उन्होंने जो सिखाया उसका कठोरता से स्वयं पालन करना; उनके बल का स्रोत- सेवा और त्याग था। उन्होंने राजनीति का मानवीयकरण किया जो कि बहुत लोगों द्वारा एक असंभव कार्य माना जा सकता है| उन्होंने बिना स्वयं के लिए किसी उपाधि, पद, या ओहदा चाहे पूरे जीवन निस्वार्थ भाव से ऊंचे आदर्शों के लिए कार्य किया।



महात्मा गांधी के बारे में बात करना ऐसा है, जैसे सूर्य को दीपक दिखाना, क्योंकि वे केवल एक बहुआयामी व्यक्तित्व ही नहीं थे, पर अपने आप में एक पूरी संस्था थे। उनकी सोच दूरदर्शी थी, क्योंकि मानवता को लेकर उनका दर्शन वर्तमान में भी प्रासंगिक है और संभवत दूर भविष्य में भी रहेगा। श्रद्धांजलि के तौर पर राजनीति और आर्थिक व्यवस्था को लेकर उनके विचारों के अलावा, उनके विश्व शांति के स्वप्न के बारे में इस आलेख में प्रस्तुत किया जाएगा|  



महात्मा गांधी – विश्व के विचारकों ने क्या कहा?

26 अगस्त, 1947 को लॉर्ड माउंटबेटन ने गांधीजी को एक पत्र में लिखा, “पंजाब में हमारे पास 55 हज़ार सैनिक हैं और बड़े पैमाने पर दंगे हो रहे हैं| बंगाल में हमारी सेना में सिर्फ एक व्यक्ति है और वहां कोई दंगे नहीं है। एकल-व्यक्ति सीमा-शक्ति को मेरा सलाम!”  ऐसी शक्ति और प्रभाव था एक नेता के तौर पर महात्मा गांधी का!

विश्व प्रसिद्ध है जबकि विंस्टन चर्चिल ने उन्हें 'अर्ध नग्न फकीर' कह कर खारिज कर दिया था, अल्बर्ट आइंस्टीन ने उनके बारे में कहा था, “भविष्य की पीढ़ी के लिए विश्वास करना कठिन होगा कि ऐसा कोई हाड़-मांस का मानव इस धरती पर था|” उन्होंने अपने अहिंसा और सविनय अवज्ञा के सिद्धांतों द्वारा सारे विश्व में करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया और अपनी मृत्यु के सत्तर वर्ष बाद आज भी वह करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।

नेल्सन मंडेला गांधी जी को अपने महान अध्यापको में से एक मानते थे और कहते थे कि उनकी शिक्षाएं दक्षिण अफ्रीका में रंग भेद को खत्म करने में सहायक रही हैं। संयुक्त राज्य अमरीका के डॉ मार्टिन लूथर किंग ने कहा, “ईसा मसीह ने हमें लक्ष्य दिए, महात्मा गांधी ने हमें युक्ति बताई|” किंग ने करोड़ों अफ्रीकन-अमेरिकी लोगों को अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए अहिंसा को एक शस्त्र के तौर पर इस्तेमाल किया। महात्मा गांधी ने म्यांमार, वियतनाम, मैक्सिको और अन्य छोटे या बड़े देशों में नागरिक अधिकार आंदोलनों को भी प्रेरित किया है।

जबकि करोड़ों लोग उन से प्रेरित हुए, वे स्वयं हेनरी डेविड थॉरियो की On the Duty of Civil Disobedience (1849) और लियो टॉल्स्टॉय की The Kingdom of God Is Within You (1894) से प्रेरित थे। महात्मा गांधी और टॉलस्टॉय ने दो वर्षों तक ‘अहिंसा का धार्मिक और व्यवहारिक प्रयोग’ के विषय पर पत्राचार किया। गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में अपने फार्म का नाम टॉलस्टॉय फार्म रखा, जहां गांधी जी और हरमन कालनबाक ने लोगों को सत्याग्रह का व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया।

1915 में दक्षिण अफ्रीका से वापिस आने के बाद महात्मा गांधी ने अंग्रेजों की बर्बरता के खिलाफ आजादी की लड़ाई शुरूआत 1917 में चंपारण में नील की खेती विवाद पर किसानों के पक्ष से की, क्योंकि उनका विश्वास था देश की आत्मा गावों में बसती हैं| आने वाले वर्षों में उनका संदेश जन-साधारण में अनपढ़ किसानों से लेकर विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग तक और समाज के सब से अधिक सुशिक्षित वर्ग तक फ़ैल गया|

महात्मा गाँधी और आज के राजनेता 

जनता के साथ काम करने वाले कार्यकर्ता को धूल से भी ज्यादा विनम्र होना चाहिए| संपूर्ण संसार अपने पैरों तले धूल को रौंदता है, किंतु एक कार्यकर्ता को इतना सरल साधारण होना चाहिए कि धूल भी उसे रौंद  सके।

अधिकांश राजनीतिक वैज्ञानिक मानते हैं कि गाँधी जी एक पैगंबर और राजनेता का मिश्रण थे। वे अच्छे से जानते थे कि राजनीति में सक्रिय हुए बिना सामाजिक-आर्थिक शोषण और राजनैतिक दमनीकरण और इनके परिणाम स्वरूप भारतीयों के गिरते हुए नैतिक स्तर को दूर करना संभव नहीं है। यदि बिना राजनीति के भारत की बेरोजगार, भूखी जनता को भोजन और रोजगार दिया जा सकता तो गांधीजी सर्वथा राजनीति को नजरअंदाज कर देते। गांधीजी किसी एक राजनीतिक दल या वर्ग के नेता नहीं थे अपितु वे तो निर्विवाद रूप से संपूर्ण जनमानस के नेता थे।

वर्तमान राजनीति, मूल्यों और नैतिकता-विहीन है और विभिन्न नेता येन-केन प्रकारेण सत्ता को हथियाना चाहते हैं, परंतु गांधी जी ने अपने नेतृत्व की आधारशिला मुख्यतः धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्र-निर्माण के सिद्धांतों पर रखी, ना कि किसी प्रकार के भौतिक लाभ या व्यक्तिगत प्रशंसा के लिए। वे धर्म के राजनीतिकरण और किसी भी प्रकार के भाई-भतीजावाद के भी विरोध में थे।

आज के राजनेताओं के ठीक विपरीत गांधी जी को एहसास था कि यदि उन्हें जनता की सेवा करनी है तो, निजी संपत्ति, धन, वैभव और आराम को त्याग कर एक स्वैच्छिक सादा और गरीबी से भरा जीवन जीना होगा। भारत और दक्षिण अफ्रीका में होने वाले सभी आंदोलनों में गांधी जी ने सार्वजनिक धन को खर्च करने में संवेदनशीलता दिखाई और हमेशा स्वच्छ और पारदर्शी रहे। यह समझना बहुत कठिन है कि कैसे राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी आज सार्वजनिक धन को भ्रष्टाचार में लिप्त होकर लूट रहे हैं।

 

महात्मा गांधी और आथिर्क विकासनीति

आज़ादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गाँधी ने ‘केवल स्वदेशी’ का युद्ध घोष दिया। उन्होंने हमारे देश की जीवन शैली बदल दी। सबको हाथ से बुना हुआ कपड़ा या जो कपड़े भारत में ही बने हैं, केवल वही पहनने होते थे। उन्होंने भारतीयों को ग्रामीण उत्पादों का उपयोग करने की सलाह दी। यह तीन महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों को पूरा करता- पहला, यह अंग्रेजों के आयात को कम करेगा जिससे उनकी अर्थव्यवस्था कमजोर होगी।; दूसरा, अगर हम विदेशों से कुछ नहीं खरीदेंगें तो हमारे उद्योग, हस्तशिल्प बढ़ेंगे; और अंत में यह भारतीयों को गावों में ही ज़्यादा से ज़्यादा रोज़गार और आय प्रदान करेगा।

ग्राम स्वराज:- भारत के 70% लोग गाँवों में रहते हैं। इसलिए भारत का विकास, गाँवों के विकास पर निर्भर करता है। तभी महात्मा गाँधी ने पंचायतीराज एवं ग्रामीण उद्योग के विकास जैसे खादी, हथकरघा, रेशम  के कीड़ो का पालन, हस्तशिल्प, आदि की ज़रूरत पर अत्यधिक ज़ोर दिया, इससे कृषि पर बोझ कम होता। अगर गाँव वालों को रोजगार उन्हीं के गावों में मिले, तो यह शहरी क्षेत्रों में प्रवसान को कम करेगा और यह गरीबों के जीवन में सुधार करेगा।

गांधीजी जमींदारी प्रथा के विरोध में थे| उनके अनुसार मुख्य रूप से किसान के पास उतनी भूमि होनी चाहिए जो उसे फसलें उगाने, अपने उत्पादों से मवेशियों को पालने और खुद को सहारा देने की क्षमता दें। उनका मानना ​​था कि लोगों के पास उतनी ही चीजों का मालिकाना हक होना चाहिए, जो एक सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आवश्यक हों और उससे अधिक कुछ भी पूरे समाज का है।

आप कभी नहीं जान सकते हैं कि आपके कार्य के क्या परिणाम आएंगे,

लेकिन अगर आप कुछ नहीं करते हैं तो कोई परिणाम नहीं होगा | (महात्मा गाँधी)

महात्मा गांधी, भारतीय संस्कृति एवं आध्यात्मिकता के विषय पर

 

"यह मेरा दृढ़ मत है कि किसी भी संस्कृति के पास इतनी धरोहर नहीं है, जितनी हमारे पास है। हमने इसे जाना नहीं है| हमें इसके अध्ययन के लिए निरुत्साहित किया गया और इसका मूल्यह्रास करना सिखाया गया। हम इसका अनुसरण करना लगभग बंद ही कर चुके थे।"

 

गांधी जी ने लोगों को सभी धर्मों के वास्तविक तत्वों को खोजने और आध्यात्मिक की गहराई में उतरने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने प्रायः जनता को कुरान और बाइबिल का संदर्भ दिया और भगवत गीता के ज्ञान को जीवन में उतारने के लिए प्रेरित भी किया। उनको विश्वास था कि इससे लोगों को जागृत करने में सहायता मिलेगी और भारत की विविधता पूर्ण संस्कृति को एकीकृत किया जा सकेगा।

किंतु आज के राजनेता गांधी जी और उनकी आध्यात्मिकता को भुला चुके हैं। आध्यात्मिकता का धर्म से कोई संबंध नहीं है। वे केवल वोट बैंक की राजनीति में विश्वास करते हैं और जनता को धर्म के नाम पर बांटने का प्रयास करते हैं, जिसका महात्मा गांधी और उनके सिद्धांतों से कोई लेना-देना नहीं है।

गांधी जी के आश्रम में प्रातः काल 4:00 बजे की सामूहिक प्रार्थना में सभी जाति, पंथ, धर्म, अमीर, गरीब, नेता और सर्वसाधारण लोग मिलकर पूजा करते थे और विनम्रता से भजन गाते थे। उनकी भजनावली में प्रथम भजन श्री गणेश को समर्पित था, अगला श्री सरस्वती मां और उसके बाद अन्य देवी-देवताओं के भजन होते थे। लोगों से इसी क्रम में गाने की अपेक्षा की जाती थी| इन सब के उपरांत बाइबिल से Lords prayer और कुरान की कुछ आयतें भी पढ़ीं जाती थी। इसके अलावा बुद्ध और जैन धर्म का भी उल्लेख होता था|  हैरान करने वाली बात है कि विभिन्न देवी-देवताओं के भजनों के क्रम कुंडलिनी और उससे संबंधित चक्रों के क्रम के अनुसार ही हैं, जैसा कि सहज योग और अन्य दूसरे विभिन्न प्राचीन धर्मों के ग्रंथों में वर्णन किया गया है।

 

महात्मा गांधी और श्री माताजी निर्मला देवी

श्री माताजी निर्मल देवी सहज योग की संस्थापक हैं| श्री माताजी के पिता श्री प्रसाद राव साल्वे, महात्मा गांधी के निकट सहयोगी और भारतीय संविधान सभा के सदस्य थे। जब उनके माता-पिता भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे थे, तब 7 वर्ष की उम्र से ही श्री माताजी कई बार महात्मा गांधी के आश्रम में उनकी अभिभावकता में रहीं। श्री माताजी पर महात्मा गांधी का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। वे कई बार गांधी जी के साथ सुबह 4:00 बजे की सामूहिक प्रार्थना से पूर्व घूमने के लिए जाया करती थी। श्री माताजी ने कई बार याद किया कि किस प्रकार गांधीजी उनसे विभिन्न विषयों पर बातचीत करते थे और कहते थे कि बड़ों की अपेक्षा बच्चे कई बार अधिक अच्छा मार्गदर्शन दे सकते हैं।

गांधी जी कठिन कार्य पालक थे और उनका विश्वास था कि जब देश में आजादी के लिए गतिशीलता तेजी से बढ़ रही थी, कठोर अनुशासन का होना आवश्यक था। इस पर श्री माताजी ने उन्हें सलाह दी कि अंदर से लोगों को अनुशासित करने के लिए आंतरिक परिवर्तन ही एकमात्र रास्ता है और गांधीजी ने माना भी कि संभवतः आंतरिक परिवर्तन से विश्व शांति भी पाई जा सकती है| श्रीमाताजी का मानना है कि जिस प्रकार उस समय देश की स्वतंत्रता के लिए सभी लोग एकजुट हो कर खड़े थे, अब समय आ गया है कि हम अपने झूठे आदर्शों, उद्देश्यों, भौतिक बेड़ियों से स्वतंत्र होकर अपने ‘स्व के तंत्र’ अर्थात सूक्ष्म तंत्र को जाने और ईश्वर से योग प्राप्त करें|

सहज योग ध्यान

सहज योग ध्यान, परम पूज्य श्री माताजी निर्मला देवी द्वारा स्थापित, एक अनोखी ध्यान विधि है जिसके द्वारा सारे विश्व में, 100 से अधिक देशों में सभी धर्मों के लोग ध्यान करते हैं। हमारे शरीर में उत्थान और आध्यात्मिक विकास के लिए, हमारी रीढ़ की हड्डी में कुंडलिनी शक्ति और सात चक्र स्थित हैं| ये चक्र हमारी शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक कल्याण के लिए उत्तरदायी हैं। जब कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है तो वह हमारे हमारे चक्रों का पोषण करती हुई हमारे अंतर को सर्वव्यापी परमात्मा के प्रेम की शक्ति से जोड़ती है। इसे बाइबल में The Cool Breeze of Holy Ghost’, कुरान में रूह और भारतीय पौराणिक ग्रंथों में इसे 'परम चैतन्य' कहा जाता है। पतंजलि ने इसे 'ऋतंभरा प्रज्ञा' कहा है।

महात्मा गांधी आक्रामकता में विश्वास नहीं रखते थे, जबकि हमारा मस्तिष्क चौबीसों घंटे केवल आक्रामकता और हिंसा के बारे में सोचता है। हम अपनी आंखों, वाणी और विचारों से हिंसा करते हैं। हम चाहे कितना भी प्रयास करें अपने चेतन मन को स्वच्छ करने की, परंतु वे हमारी 24 घंटे की क्रियाओं को शुद्ध करने के लिए काफी नहीं है। फिर हम अपने अवचेतन मन से विचारों की लगातार बमबारी से कैसे मुक्त होंगे?

सहज योग में कुंडलिनी जागरण के द्वारा हमारे अंदर एक परिवर्तन आता है और हम चिंता, क्रोध, ईर्ष्या, कलह, विवाद, अनैतिकता, असुरक्षा आदि से मुक्त हो कर नैतिक, रचनात्मक, शांत, आत्मविश्वासी, क्षमाशील और एक संतुलित व्यक्तित्व बन जाते हैं| जब कुंडलिनी का जागरण होता है तब हम निर्विचार समाधि में चले जाते और अंदर से एकदम शांत हो जाते हैं। अन्तः शांति प्राप्त करने के बाद हम, शांति प्रसारित करने लगते हैं और अपने चारों ओर एक शांतिपूर्ण वातावरण का निर्माण करते हैं।

श्री माताजी निर्मला देवी ने स्वयं गाँव-गाँव जाकर, गांव में लोगों में पवित्रता व अबोधिता के कारण, सहज योग का प्रचार-प्रसार किया। उनका कहना था कि सहज योग गांव में बसता है। सहज योग में फसल की पैदावार बढ़ाने की क्षमता है, जिसके लिए जरूरत है केवल कुंडलिनी जागृति और उसके द्वारा साधक के नियमित ध्यान से प्रवाहित होने वाली दिव्य ऊर्जा का उपयोग करना। ऐसे दस्तावेज हैं कि सहज योग फसल की उपज को 30% से अधिक बढ़ाने में लाभकारी है। पूरे भारत में 3000 से भी अधिक सहज योग ध्यान केंद्र हैं जहां हम अपना आत्म साक्षात्कार प्राप्त कर सकते हैं या फिर इंटरनेट पर भी निम्नलिखित दी गई वेबसाईट पर भी यह प्राप्त किया जा सकता है| 

आइए हम अपने स्वयं के भले के लिए और मानवता के उत्थान हेतु अपने आंतरिक परिवर्तन की आकांक्षा करें और बापू के सार्वभौमिक शांति के सपने को पूरा करने में अपने तरीके से योगदान दें।

 

वह परिवर्तन बनें जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं। ...महात्मा गांधी